आशा की किरन
चंद लम्हों की है यह जिंदगी दोस्तों बेर में का बिखर जाए दोस्तों ए पागल ज़रा संभल भी जा किस उम्मीद मैं जी रहा हैं तू इंसान हूं कहा उसने मायूसी नही समझता आशा की किरण हर सवेरे इस धरती को रोशन करती है आँख खोल के देख ज़रा इंसानियत का जनाजा अभी उठा नही है है उम्मीद एक सच्चे दिन की ना हो किसी से बेर ना हो यह दुश्मनी बहती है हार शरीर से वो लाल बस नाम अलग दिए है बनाया था खुदा ने यह जहान इंसानों ने इसमें हैवानियत भर दी एक नया सवेरा होगा कल फिर से आशा की किरन फिर आएगी मन की आंखें भी खोल के देखो जल ना जाए यह जहान हमारा