जियो
जिंदगी की दौड़ में लंगड़ाते हुए हम
चल रहे है जब जीना हो गया है मुश्किल
हर सांस की लगती है बोली
बंद कमरों में जी रहे है हम।
एक दूसरे से करते है नफरत
अंध विश्वास की गलियों में ठोकर खाते
भटके हुए और तन्हा मुसाफिर बने हम
ना ठिकाना कोई ना मंजिल है
फिर भी लड़ते है हम
कुछ बातें कुछ यादें
सब भूल के बस जिंदा है हम
और कितने दिन जिंदा लाश बनेंगे हम
जागो, लड़ो, कुछ कर भी दो
जिनको आपने चुना वो नपुंक्सक निकले
वोट की दौड़ में इंसानियत भूल गए
जाती धर्म भेद भाव से जिंदगी नहीं चलती है दोस्त
सहारा बनो, तो जाने।
यह खेल नही हकीकत है दोस्तों, लड़े तो हम किसलिए, चंद सांसों में ही सिमट गए हम
कच्चे मिट्टी का है यह शरीर इसको क्या मालूम, रूह की बात मानो तो माने हम
जल गए ढेरों में मर गए लाखों में
लड़े तो हम किस लिए, कुछ सांसों के लिए।
भूल जाओ इन भेद भावों को, इंसान हो, पहचानो इंसानों को,
जब मौत की आती है दस्तक, ना रहता है वो धर्म, ना रहती है वो जाती, बस रहती है तो चार, जो कंधे पे लेके चलते आखरी बार
जागो, जानो और सीखो, ना करो किसी से बेर ना रखो कोई भेद, चंद सांसों के हो मेहमान, जियो और जीने दो।
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